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धार में बाल स्वयंसेवकों का विराट पथ संचलन : कदमताल और घोष की धुनों से गूंजा शहर, वक्ताओं ने दिया राष्ट्र निर्माण का संदेश

धार। हाथों में अनुशासन, चेहरे पर राष्ट्रभक्ति का तेज और कदमताल की लयबद्ध गूंज—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बाल स्वयंसेवकों ने जब पूर्ण गणवेश में शहर की सड़कों पर कदम बढ़ाए, तो पूरा वातावरण राष्ट्रभाव से सराबोर हो उठा। मौका था धार नगर में आयोजित बाल स्वयंसेवकों के विराट पथ संचलन का, जहाँ सैकड़ों नन्हे कदमों ने एकता और संगठित समाज की सशक्त तस्वीर पेश की।

यह भव्य पथ संचलन धार के ऐतिहासिक किला मैदान से प्रारंभ हुआ। पूर्ण संघ गणवेश में सुसज्जित बाल स्वयंसेवक अनुशासित वाहिनियों में कतारबद्ध होकर कदमताल मिलाते हुए शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरे और पुनः किला मैदान पहुंचकर संचलन का औपचारिक समापन हुआ। संचलन के दौरान विभिन्न रचनाओं के साथ गूंजता घोष दल विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा, जिसकी मधुर और ओजस्वी धुनों ने पूरे मार्ग में नगरवासियों का ध्यान खींचा।

संचलन से पूर्व किला मैदान पर आयोजित सभा की अध्यक्षता शैलेश शर्मा ने की। मंच पर नगर कार्यवाह गोपाल डोड तथा मुख्य वक्ता के रूप में धार जिला सह शारीरिक प्रमुख महेश देशवाली उपस्थित रहे।

सभा को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता महेश देशवाली ने कहा कि दैनिक दिनचर्या और आचरण के माध्यम से भी राष्ट्र की सेवा की जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे महापुरुष बचपन से ही राष्ट्रभक्त थे और बाल्यकाल में मिले संस्कारों के कारण ही वे आगे चलकर महापुरुष कहलाए। राष्ट्र के उत्थान के लिए बच्चों का शाखा से जुड़ना आवश्यक है, क्योंकि संघ की शाखाओं में गीतों और सामूहिक खेलों के माध्यम से सामूहिकता की भावना जागृत होती है, जिससे व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ राष्ट्र कार्य में योगदान की प्रेरणा मिलती है।

संबोधन के दौरान संघ की पृष्ठभूमि और संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंगों को रेखांकित किया गया। वर्ष 1925 में संघ की स्थापना भी बाल स्वयंसेवकों को जोड़कर शाखा लगाने से हुई थी, जो आज एक विशाल संगठन का रूप ले चुका है। डॉ. हेडगेवार के बचपन में वंदेमातरम उद्घोष के कारण स्कूल से निष्कासन और वर्ष 1910 में कलकत्ता में डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान ‘अनुशीलन समिति’ से जुड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों, गुप्त संगठन पद्धति व अनुशासन के अनुभवों ने ही यह नींव रखी कि केवल सीमित बलिदान नहीं, बल्कि पूरे समाज में राष्ट्रीय चेतना, चरित्र और संगठन शक्ति खड़ी करना अनिवार्य है। बचपन में रोपे गए यही संस्कार आगे चलकर किसी भी राष्ट्र के व्यापक उत्थान और सामाजिक चेतना का स्थायी आधार बनते हैं।

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