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रफ्तार का जुनून या मौत का जाल, आखिर कब तक सस्ती रहेगी मजदूरों की जान?

सुनिल यादव
धार में इंदौर-अहमदाबाद हाईवे पर बुधवार रात जो हुआ, वह केवल एक ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि व्यवस्था की ‘हत्या’ है। 50 मजदूरों को एक छोटे से पिकअप वाहन में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस देना और फिर उस वाहन का 100 की रफ्तार से दौड़ना—यह चीख-चीख कर कह रहा है कि हमारे सिस्टम में गरीब की जान की कीमत चवन्नी से ज्यादा नहीं है।

सवालों के घेरे में प्रशासन

हादसे के बाद मुआवजे का मरहम तो लगा दिया गया, लेकिन असली सवाल जस के तस हैं। नेशनल हाईवे पर जब यह ओवरलोड वाहन दौड़ रहा था, तब हमारी हाई-टेक पुलिस और परिवहन विभाग (RTO) की नजरें कहां थीं? क्या 100 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ते उस ‘यमराज’ को रोकने वाला कोई नहीं था? महज एक टायर फटने से 16 जिंदगियां खाक हो गईं, जिनमें 5 मासूम बच्चे भी शामिल थे। इन बच्चों का क्या कसूर था?

अस्पतालों की बदहाली: जख्मों पर नमक

हादसे के बाद की तस्वीर और भी भयावह रही। जिला अस्पताल में घायलों के लिए बेड तक मयस्सर नहीं हुए। तड़पते हुए मजदूरों का जमीन पर इलाज होना हमारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के ‘विश्वगुरु’ होने के दावों की पोल खोलता है। स्ट्रेचर की कमी और फर्श पर पड़ा खून यह बताने के लिए काफी है कि हम आपदाओं के लिए कभी तैयार नहीं होते।

सिर्फ मुआवजा समाधान नहीं

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने आर्थिक मदद का ऐलान किया है, यह सराहनीय है। लेकिन क्या 4 लाख रुपये उस मां की गोद भर पाएंगे जिसने अपना लाल खोया है? क्या यह राशि उन 8 महिलाओं की कमी पूरी कर पाएगी जिनका पूरा परिवार उजड़ गया? प्रशासन को अब ‘मुआवजा मोड’ से निकलकर ‘एक्शन मोड’ में आना होगा।

जनसमाचार एमपी का मत

जब तक सड़कों पर ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार के खिलाफ सख्त जमीनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे ‘ब्लैक स्पॉट’ निर्दोषों का खून पीते रहेंगे। सड़कों को केवल कांक्रीट से मत बनाइए, उन्हें सुरक्षित भी बनाइए। वरना कल फिर किसी हाईवे पर कोई मजदूर अपनी बेबसी और सिस्टम की लापरवाही का शिकार होगा।
अब जागने का वक्त है, वरना ये मौतें सिलसिला बन जाएंगी।

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