लेखक संघ की महफिल में उमड़े जज्बात, कवियों ने गजलों से बांधा समां
धार। सुरों की महफिल, जज्बातों का समंदर और शब्दों के जादूगरों की जुगलबंदी… कुछ ऐसा ही नजारा था मध्यप्रदेश लेखक संघ की मासिक ‘काव्य निशा’ का। शेषनाग सिनेमा परिसर में सजी इस साहित्यिक शाम में जहां एक तरफ रचनाओं ने समां बांधा, वहीं दूसरी तरफ महफिल की आंखें नम भी हुईं, जब देश के हरदिल अजीज शायर बशीर बद्र को शिद्दत के साथ याद किया गया।
वेबसाइट के पाठकों के लिए पेश है इस शानदार साहित्यिक शाम की एक-एक झलकी:
बशीर बद्र को नम आंखों से श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की शुरुआत बेहद भावुक क्षणों के साथ हुई। हाल ही में दुनिया को अलविदा कह गए मशहूर शायर बशीर बद्र को पूरी महफिल ने सामूहिक रूप से श्रद्धांजलि दी। मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष श्रीवल्लभ विजयवर्गीय ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि “बद्र साहब के जाने से देश ने हिंदी और उर्दू दोनों ही जुबानों में अपनी कलम का लोहा मनवाने वाले एक महान साहित्यकार को खो दिया है। उनका जाना साहित्य जगत के लिए एक ऐसा शून्य है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।”
इसी कड़ी में श्रीकांत द्विवेदी ने अपनी सशक्त रचनाओं के जरिए बद्र साहब की उन मशहूर गजलों और शेरों को याद किया, जो आज भी लोगों की जुबान पर राज करते हैं।
जब कवियों ने बांधा समां, झूम उठे श्रोता
श्रद्धांजलि के बाद महफिल का मिजाज बदला और एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां देखने को मिलीं:
- अनीता मुकाती: इन्होंने अपनी बेहतरीन गजलों से कार्यक्रम को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। उनकी हर बहर पर खूब तालियां बजीं।
- गीत और गजलों की त्रिवेणी: कवि दिलीप जैन ‘पथिक’, नंदकिशोर बावनिया और जितेंद्र बावनिया ने अपने खास अंदाज में गीतों और गजलों की ऐसी झड़ी लगाई कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।
संचालन और आभार
इस पूरी महफिल को एक सूत्र में पिरोने का काम किया कैलाश चंद्र बंसल ने। उन्होंने न सिर्फ गोष्ठी का सफल और जीवंत संचालन किया, बल्कि बीच-बीच में अपने खूबसूरत गीतों और भजनों की प्रस्तुति से समां बांधे रखा। शाम के आखिरी पड़ाव पर कमल पांचाल ने कार्यक्रम में आए सभी साहित्यकारों और सुधी श्रोताओं का दिल से आभार व्यक्त किया।
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