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महामातम: धार में एक साथ उठीं 14 अर्थियां, श्मशान छोटा पड़ा तो खेतों में जलाईं चिताएं

कलेजा चीर देने वाला मंजर: किसी का पूरा परिवार खत्म, तो कोई मां की गोद से छिटककर काल के गाल में समा गया; पीएम-राष्ट्रपति ने जताया दुख

धार | धार जिले के सुल्तानपुर में गुरुवार का सूरज रोशनी नहीं, मातम लेकर आया। बुधवार रात टायर फटने से हुए उस खौफनाक पिकअप हादसे ने 16 हंसते-खेलते परिवारों की खुशियां छीन लीं। जब नयापुरा और सुल्तानपुर की गलियों से एक साथ अर्थियां निकलीं, तो पत्थर दिल इंसान की आंखें भी नम हो गईं। श्मशान घाट कम पड़ गए, एक ही परिवार के 7 सदस्यों को मुखाग्नि दी गई तो पूरा गांव फूट-फूटकर रो पड़ा।

3 बड़ी बातें: जो इस हादसे की भयावहता बताती हैं

  1. डावर परिवार का वंश खत्म: नयापुरा के मुन्नालाल डावर के घर अब सन्नाटा है। परिवार के 7 सदस्य (3 बच्चे, 2 युवा) अब सिर्फ तस्वीरों में रह गए हैं।
  2. सड़क पर बिछ गई लाशें: टायर फटने के बाद पिकअप इतनी तेजी से पलटी कि मजदूरों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। सड़क पर चारों ओर चीख-पुकार और खून था।
  3. 8 महिलाएं, 6 बच्चे: मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या उन मासूमों और महिलाओं की है, जो मजदूरी कर घर लौट रहे थे।

मौत की पिकअप और सिस्टम की ‘अंधेरी’ आंखें

​पिकअप हादसे अक्सर ‘हादसे’ नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक हत्याएं’ होते हैं। धार की सड़कों पर यह कोई पहली घटना नहीं है।

    • भेड़-बकरी सा भरा सफर: 15-20 लोगों की क्षमता वाली पिकअप में 35 से ज्यादा लोग भरे थे।
    • टायर फटने का इंतजार: पुरानी गाड़ियां और ओवरलोडिंग का कॉम्बिनेशन ही इस मौत का मुख्य कारण बना।
    • चेकिंग के नाम पर खानापूर्ति: आरटीओ और पुलिस नाकों पर इन गाड़ियों को क्यों नहीं रोका जाता? यह सवाल आज हर ग्रामीण पूछ रहा है।

“अपनों को खोने का दर्द लफ़्ज़ों में बयां नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी से बात हुई है, अब प्रशासन के साथ मिलकर सख्त गाइडलाइन बनाएंगे ताकि किसी और की गोद सूनी न हो।” > — सावित्री ठाकुर, केंद्रीय राज्य मंत्री

 

मदद का मरहम: दिल्ली से भोपाल तक हलचल

​हादसे की गूंज दिल्ली तक पहुंची। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर संवेदनाएं जताईं। राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता और घायलों के समुचित इलाज के निर्देश दिए हैं। लेकिन क्या यह मुआवजा उन मासूमों को लौटा पाएगा जो अब कभी स्कूल नहीं जा सकेंगे?

कब थमेगा यह सिलसिला?

जब तक मजदूरों के परिवहन के लिए सुरक्षित बसें या वाहन अनिवार्य नहीं किए जाएंगे और पिकअप में इंसानों को ‘सामान’ की तरह भरना बंद नहीं होगा, तब तक सड़कों पर यूं ही चिताएं जलती रहेंगी। प्रशासन को अब ‘गाइडलाइन’ से आगे बढ़कर ‘कार्रवाई’ करनी होगी।

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