धार वन मंडल ने बीट स्तर पर शुरू किया मिशन
धार | भीषण गर्मी में जब प्राकृतिक जल स्रोत दम तोड़ने लगते हैं, तब वन्यजीव पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों का रुख करते हैं। इससे न केवल वन्यजीवों की जान को खतरा होता है, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति भी बनती है। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए धार वन मंडल ने जंगलों के भीतर ही पानी सहेजने का बड़ा अभियान शुरू किया है।
जंगल के भीतर ही ‘प्यास’ बुझाने का इंतजाम
वन मंडल अधिकारी विजयानंथम टी.आर. के मार्गदर्शन में धार, धामनोद, मांडू, सरदारपुर, टाण्डा, बाग और कुक्षी परिक्षेत्रों में युद्ध स्तर पर काम चल रहा है। विभाग का लक्ष्य है कि वन्यजीवों को जंगल की सीमा से बाहर न निकलना पड़े।

कैसे सहेजा जा रहा है पानी? 3 बड़े कदम:
- झिरियों की सफाई: जंगलों में मौजूद प्राकृतिक झिरियों (Natural Springs) की सफाई की जा रही है ताकि पानी का रिसाव बना रहे और वह सूखे नहीं।
- नए सोसर (Cemented Troughs): वन्यप्राणियों के लिए नए सोसर बनाए गए हैं। पुराने सोसरों की मरम्मत और सफाई कर उनमें टैंकरों के माध्यम से नियमित पानी भरने की व्यवस्था की गई है।
- तालाबों का गहरीकरण: जल स्तर सुधारने के लिए नए तालाबों का निर्माण किया जा रहा है और पुराने तालाबों को गहरा किया जा रहा है ताकि वे लंबे समय तक पानी रोक सकें।

बीट गार्ड्स को मिली बड़ी जिम्मेदारी
मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए मैदानी अमले को अलर्ट मोड पर रखा गया है। बीट स्तर पर तैनात कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रतिदिन जल स्रोतों की निगरानी करें। किसी भी सोसर में पानी खत्म होने से पहले ही उसकी रिफिलिंग सुनिश्चित करने को कहा गया है।
DFO का विजन
“हमारा मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में ही पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना है। इससे जनहानि की आशंका कम होगी और वन्यजीव भी सुरक्षित रहेंगे। सभी रेंजों में इसकी निरंतर मॉनिटरिंग की जा रही है।”
– विजयानंथम टी.आर., वन मंडल अधिकारी, धार
जनसमाचार एमपी इनसाइट: जिले के मांडू और धामनोद जैसे क्षेत्रों में लेपर्ड (तेंदुए) और अन्य वन्यजीवों की सक्रियता अधिक रहती है। जंगल में पानी की उपलब्धता बढ़ने से इन क्षेत्रों के आसपास बसे गांवों के लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
