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720 साल बाद भोजशाला में गूंजी साहित्य की गूंज, मां वाग्देवी के चरणों में अर्पित हुआ उपन्यास ‘मिश्री’

राजा भोज के काल जैसी स्वर्णिम याद हुई ताजा

धार। धार की ऐतिहासिक भोजशाला रविवार को एक ऐतिहासिक और भावुक क्षण की गवाह बनी। निमाड़ अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार राकेश राणा के नए उपन्यास ‘मिश्री’ का विमोचन इस पवित्र परिसर में किया गया। इस दौरान पुस्तक की पहली प्रति मां वाग्देवी के चरणों में अर्पित की गई। यह आयोजन धार नगरी के लिए इसलिए बेहद खास रहा, क्योंकि राजा भोज के काल के बाद यहाँ किसी साहित्यिक कृति के विमोचन का यह पहला मौका था।

यह गरिमामयी कार्यक्रम रविवार को धार की ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में आयोजित हुआ। विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मध्य प्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष वल्लभ विजयवर्गीय शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता भोज उत्सव समिति के संयोजक गोपाल शर्मा ने की, जबकि संचालन सेवानिवृत्त शिक्षाविद डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने किया। इस दौरान मालवा और निमाड़ अंचल के कई वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और रसिक पाठक मौजूद रहे।

मिश्री से निंबोली बनने की कहानी

लेखक राकेश राणा ने अपने उपन्यास ‘मिश्री’ के बारे में बताते हुए कहा कि यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके जीवन में शुरुआत में बहुत मिठास थी। बाद में सामाजिक परिस्थितियों और कड़वाहट के कारण उसका जीवन ‘मिश्री’ से ‘निंबोली’ जैसा कड़वा हो गया। कार्यक्रम में पत्रकार प्रीतम लखवाल ने लेखक का परिचय दिया, वहीं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष शरद जोशी और महामंत्री श्याम शर्मा ने लेखक का शाल व श्रीफल से सम्मान किया। 

पाठकों के दिलों में घुलेगी मिठास

मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष वल्लभ विजयवर्गीय ने इसे एक दुर्लभ और पवित्र अवसर बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि उपन्यास ‘मिश्री’ अपने नाम की तरह ही पाठकों के दिलो-दिमाग में मिठास घोलने में पूरी तरह सक्षम होगी। विमोचन के बाद परिसर में एक सरस काव्य गोष्ठी का भी आयोजन हुआ, जिसमें कृष्णकांत दुबे, अनिता मुकाती, कैलाश बंसल सहित कई कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन पत्रकार नीरज ठक्कर ने किया।

धार के रचनाकारों के अनुसार, राजा भोज के काल में ग्रंथों का विमोचन इसी सरस्वती मंदिर परिसर में होता था। लगभग 720 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह पहला मौका है जब किसी साहित्यिक कृति को मां सरस्वती के चरणों में समर्पित कर उसका मुख पटाभिषेक किया गया है। भोजशाला की मुक्ति के बाद हुए इस पहले साहित्यिक और काव्य आयोजन ने भविष्य के लिए एक नई शुरुआत की है, जिसे मालवा और निमाड़ अंचल के सांस्कृतिक व साहित्यिक पुनरुत्थान के रूप में देखा जा रहा है।

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