बुजुर्गों की पहल: आश्रम के पुरुषों के बाद अब महिलाओं ने संभाली रसोई, कर्मचारियों ने भी चखा ममता भरा स्वाद
धार। वृद्धाश्रम में बना-बनाया भोजन मिलना आम बात है, लेकिन जब ममता और अनुभव के हाथ खुद रसोई संभाल लें, तो स्वाद ‘प्रसाद’ बन जाता है। श्रद्धालय वृद्धाश्रम में चल रहे ‘हम भी कर सकते हैं विचार’ अभियान के तहत एक भावुक और ऊर्जा से भरी तस्वीर सामने आई। आश्रम की बुजुर्ग महिलाओं ने न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने पूरे ‘आश्रम परिवार’ के लिए खुद अपने हाथों से लजीज भोजन तैयार किया।
पुरुषों ने दिखाई थी राह, महिलाओं ने लगाया स्वाद का तड़का
हाल ही में 20 तारीख को आश्रम के पुरुष साथियों ने खुद भोजन बनाकर सबको खिलाया था। इसी नवाचार को आगे बढ़ाते हुए 5 तारीख को आश्रम की मातृशक्ति ने कमान संभाली। सुबह से ही रसोई में उत्साह का माहौल था। दादी-नानी की इस टोली ने मेन्यू में दाल-चावल, सब्जी, रोटी और सलाद के साथ सबकी मनपसंद ‘चटनी वाले दही-बड़े’ शामिल किए।
पहले अपनों को खिलाया, फिर खुद पाया प्रसाद
भारतीय परंपरा और संस्कारों का निर्वाह करते हुए इन वृद्ध महिलाओं ने पहले आश्रम के सभी साथियों और प्रबंधन को बड़े प्रेम से भोजन कराया। जब सब तृप्त हो गए, तब अंत में बनाने वाली टीम ने एक साथ बैठकर भोजन किया।
“आज खाने में वो स्वाद था जो केवल मां के हाथों में होता है। समय और स्वाद का ऐसा तालमेल देख हम दंग हैं।” — आश्रम के नियमित रसोई कर्मचारी
सक्रियता ही नई शक्ति: डॉ. दीपेंद्र शर्मा
भोज शोध संस्थान के संस्थापक डॉ. दीपेंद्र शर्मा, सत्कार अधिकारी जयंत जोशी और योगाचार्य रामकिशोर पांडेय ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे ‘सक्रिय वृद्धजन-नव सामर्थ्य’ करार दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से बुजुर्गों में आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें खालीपन का अहसास नहीं होता।
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प्रोत्साहन: प्रबंधन टीम की रानी पंवार और विद्या गुंजाल ने महिलाओं का उत्साहवर्धन किया।
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अपडेट: मीडिया प्रभारी राकी मक्कड़ ने बताया कि आश्रम में अब ऐसे आयोजन नियमित अंतराल पर किए जाएंगे ताकि बुजुर्गों की सक्रियता बनी रहे।
जनसमाचार एमपी खास : ‘किचन’ में खिलखिलाहट तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि कैसे उम्र को धता बताकर ये महिलाएं पूरी ऊर्जा के साथ रोटियां बेल रही हैं और दही-बड़े तैयार कर रही हैं। यह सिर्फ भोजन बनाना नहीं, बल्कि यह साबित करना था कि ‘हुनर कभी बूढ़ा नहीं होता’।
