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कलेक्टर जनसुनवाई : नीचे के सिस्टम से हारे आदिवासियों और बुजुर्गों को सिर्फ ‘आश्वासन’ का सहारा, 10-10 बार चक्कर काटने को मजबूर लोग

जनसुनवाई के बंद कमरों से बाहर आकर कलेक्टर को घेर रहे पीड़ित

धार। प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को देखना हो, तो मंगलवार को जिला मुख्यालय पर होने वाली कलेक्टर की जनसुनवाई इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है। दूरदराज के क्षेत्रों से, लाठी के सहारे चलते बुजुर्ग और महिलाएं अपनी अंतिम उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं, लेकिन यहां की लंबी कतारें और बार-बार मिलने वाले आश्वासन अब इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालात यह हैं कि समय खत्म होने पर जब कलेक्टर बाहर निकलते हैं, तो निराश लोग अपनी फाइलों के साथ उन्हें घेरने को मजबूर हो जाते हैं।

यह पूरा मामला धार जिला मुख्यालय का है, जहां मंगलवार को आयोजित साप्ताहिक जनसुनवाई में दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से करीब 121 आवेदक अपनी गंभीर शिकायतें लेकर पहुंचे थे। पीड़ितों में हुमानपुर (सरदारपुर तहसील) के वे आदिवासी और ग्रामीण शामिल थे, जिनकी जमीन, मकान और आपसी विवादों की सुनवाई स्थानीय स्तर पर एसडीएम और तहसीलदार द्वारा नहीं की गई। हारकर जब यह भीड़ कलेक्टर राजीव रंजन मीना के पास पहुंची, तो उन्हें एक बार फिर मामला स्थानीय स्तर पर ही (एसडीएम या सीईओ के पास) ले जाने की बात कहकर वापस भेज दिया गया।

जमीन और मकानों पर अवैध कब्जे, पीड़ितों की जुबानी उनकी लाचारी

जनसुनवाई में पहुंचे लोगों ने अपने साथ हो रहे अन्याय की कहानी बयां की। हुमानपुर से आए एक पीड़ित ने बताया कि वह 10 बार जनसुनवाई के चक्कर काट चुका है। विपक्षी (आदिवासी) उसे अपनी बात रखने नहीं देता, और जिम्मेदार अधिकारी मौके पर जाकर जांच करने को तैयार नहीं हैं।

अन्य आवेदकों ने बताया कि उनकी जमीन पर कुछ रसूखदार लोग कब्जा करके बैठे हैं। विरोध करने पर उन्हें पिछले दो महीनों से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं।

एक अन्य पीड़ित ने बताया कि उनके मकान की दीवार तोड़कर जबरन कॉलम खड़े कर दिए गए। एक महीने से सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज है, लेकिन वहां से भी सिर्फ ‘कार्रवाई चल रही है’ का घिसा-पिटा जवाब मिल रहा है।

विधिक प्रक्रियाओं में लगता है समय

कलेक्टर राजीव रंजन मीना ने बताया कि जमीन से जुड़े मामलों में कई बार जटिल कानूनी और विधिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इनमें विधिवत प्रकरण दर्ज करना होता है और दोनों पक्षों की बात सुननी पड़ती है, इसलिए समाधान में स्वाभाविक रूप से समय लगता है। इसके अलावा तहसील स्तर और सीएम हेल्पलाइन का कॉल सेंटर भी लगातार काम कर रहा है, जहां नागरिक अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।

यह स्थिति किसी एक मंगलवार की नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे प्रशासनिक ढर्रे का परिणाम है। यदि तहसील और सब-डिवीजन (एसडीएम) स्तर पर जमीनी अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन नहीं किया, तो आने वाले समय में जिला मुख्यालय पर आवेदकों का दबाव और असंतोष और अधिक बढ़ेगा। सीएम हेल्पलाइन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद अगर एक-एक महीने तक शिकायतों का निपटारा नहीं होता, तो इससे पूरी शासकीय शिकायत निवारण प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ेगा। विधिक प्रक्रियाओं के नाम पर समय लगना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन न्याय में अत्यधिक देरी पीड़ितों के सब्र का इम्तिहान ले रही है।

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