धार। सरकारी बैठकों के चमचमाते कमरों में जब आत्मनिर्भरता की नीतियां पकती हैं, तो उनका जायका कितना लाजवाब होता है, यह धार जिले के प्रशासनिक गलियारों में आसानी से देखा जा सकता है। एक तरफ जिला प्रशासन ‘मध्यप्रदेश एकीकृत मत्स्य उद्योग नीति 2026’ के तहत जिले को मत्स्य पालन में आत्मनिर्भर बनाने का खाका खींच रहा है, तो दूसरी तरफ जिले की जीवनदायिनी मान नदी में ऑक्सीजन की एक-एक बूंद के लिए तरसती मछलियां दम तोड़ रही हैं।
कागजी दावों और जमीनी हकीकत का यह अनूठा संगम देखना हो तो धार जिला इस वक्त सबसे सही जगह है।
कागजों में तैरता ‘एक्वाकल्चर’ और ‘इको-टूरिज्म’
हाल ही में कलेक्टर साहब की अध्यक्षता में एक हाई-प्रोफाइल बैठक संपन्न हुई। बैठक का मुख्य मकसद ग्रामीण, आदिवासी और कमजोर वर्ग के चेहरे पर खुशी लाना और केज कल्चर, इंटीग्रेटेड फिश फार्मिंग जैसे भारी-भरकम शब्दों से निवेशकों को आकर्षित करना था। साहबों ने तय किया है कि एक ‘समयबद्ध कार्ययोजना’ (टाइमलाइन) बनाई जाएगी, ताकि आधुनिक तकनीक का लाभ सीधे मैदानी स्तर पर मछुआरों तक पहुंचे और जिला निर्यात के नक्शे पर चमक उठे।
फाइलें दुरुस्त हैं, विजन टाइम-बाउंड है, और अधिकारियों के चेहरे पर आत्मनिर्भरता की मुस्कान!
मैदान की जमीनी हकीकत
अब जरा एसी कमरों से बाहर निकलकर मनावर की मान नदी का रुख कीजिए। यहां की तस्वीर आपको किसी लहलहाते खेत या गोल्फ कोर्स जैसी लग सकती है, लेकिन मुगालते में मत रहिएगा! यह डेढ़ किलोमीटर में फैली घनी जलकुंभी की हरी चादर है।
जिस नदी में वैज्ञानिक तकनीकों से ‘मत्स्य उत्पादन बढ़ाने’ के सपने देखे जा रहे हैं, उसी नदी के पेट में जलकुंभी के चलते ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है। जलीय जीव तड़प-तड़पकर मर रहे हैं और सड़ांध मारते किनारों पर तैरती मरी हुई मछलियां प्रशासनिक मुस्तैदी का मुस्कुराकर स्वागत कर रही हैं।
जेसीबी बनाम जलकुंभी : खानापूर्ति का ग्रैंड शो
नदी की इस सड़ांध को दूर करने के लिए नगर पालिका ने अपनी जगप्रसिद्ध ‘जेसीबी तकनीक’ का इस्तेमाल किया। लेकिन डेढ़ किलोमीटर लंबी जलकुंभी के आगे बेचारी जेसीबी भी हांफ गई। अब जब पानी सिर से ऊपर (या यूं कहें कि जलकुंभी के नीचे) जा चुका है, तब नाव खरीदने और ‘वैज्ञानिकों’ की सलाह लेने का फरमान जारी हुआ है। डर अब यह है कि अगर यह हरी चादर ऐसे ही बहती रही, तो नर्मदा नदी में पहुंचकर एक नया पर्यावरणीय रिकॉर्ड न बना दे।
संपादकीय टिप्पणी :
एक तरफ जिले को मत्स्य उत्पादन में ‘ग्लोबल’ बनाने की समयबद्ध योजनाएं बन रही हैं, और दूसरी तरफ जो प्राकृतिक जलस्रोत हमारे पास मौजूद हैं, वे प्रशासनिक अनदेखी और खानापूर्ति की बलि चढ़ रहे हैं। जब तक मान नदी जैसी जीवनदायिनियों का दम घुटता रहेगा, तब तक बैठकों में तय की गई ‘एकीकृत मत्स्य नीतियां’ सिर्फ फाइलों में ही तैरती नजर आएंगी। सवाल यह है कि जब नदियां ही नहीं बचेंगी, तो साहब लोग आत्मनिर्भरता का जाल किस पानी में फेंकेंगे?
