शरीर और चरित्र को खोखला करता है नशा-न्यायिक मजिस्ट्रेट सोनी
धार। क्या सलाखों के पीछे अध्यात्म और आत्मबल के सहारे जीवन की सबसे अंधेरी लत को हराया जा सकता है? धार जिला जेल में बंद बंदियों के बीच जब नशा मुक्ति की बात छिड़ी, तो माहौल कुछ ऐसा ही उम्मीद जगाने वाला नजर आया। ‘नशीली दवाओं के दुरुपयोग एवं अवैध तस्करी के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ के मौके पर जेल परिसर में एक भव्य जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका मकसद बंदियों को नशे के दुष्प्रभावों से बचाकर वापस समाज की मुख्यधारा में लाना था।
मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में शनिवार को धार की जिला जेल में इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, धार के सचिव और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रदीप सोनी शामिल हुए। इस दौरान ब्रह्मकुमारी संस्था की शीतल दीदी, शीला दीदी और राधेश्याम सहित जिला विधिक सहायता अधिकारी सिमोन सुलिया और अधिवक्ता मोहम्मद जीशान शेख (एलडीसीए) भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रदीप सोनी ने गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नशा एक ऐसा अभिशाप है जो व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क और चरित्र को अंदर से पूरी तरह खोखला कर देता है। इससे न केवल व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ता है, बल्कि पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से बर्बाद हो जाता है। उन्होंने बंदियों को इससे उबरने का एक व्यावहारिक रास्ता दिखाते हुए कहा कि यदि हम प्रतिदिन ईश्वर की भक्ति में मन लगाएं और आध्यात्मिकता का मार्ग अपनाएं, तो कठिन से कठिन लत को भी आसानी से छोड़ा जा सकता है।
इस अवसर पर ब्रह्मकुमारी संस्था से आईं शीतल दीदी, शीला दीदी और राधेश्याम ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक स्वस्थ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण के लिए समाज से नशे का समूल नाश होना अनिवार्य है। इसके बाद उपस्थित सभी बंदियों और जेल स्टाफ को नशा मुक्त जीवन जीने की गंभीर शपथ दिलाई गई। कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर ‘नशा मुक्त भारत’ के निर्माण का सामूहिक संकल्प लिया। वहीं, सिमोन सुलिया और अधिवक्ता मोहम्मद जीशान शेख ने बंदियों को कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से नशा मुक्ति के महत्व की जानकारी दी।
जेल प्रशासन और विधिक सेवा प्राधिकरण का यह साझा प्रयास आने वाले दिनों में बंदियों के पुनर्वास में बड़ा मददगार साबित हो सकता है। जेल की चारदीवारी के भीतर बंदियों को अध्यात्म और कानूनी काउंसलिंग के जरिए नशे से दूर रखने की यह मुहिम, सजा पूरी होने के बाद उनके एक बेहतर नागरिक के रूप में समाज में लौटने का आधार बनेगी। इस तरह के जागरूकता अभियान भविष्य में जेलों के भीतर अपराध की मानसिक जड़ (नशे की लत) को खत्म करने की दिशा में एक प्रभावी कदम हैं।
