पर्यावरण संरक्षण के साथ आत्मनिर्भरता का संदेश
धार। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के आह्वान से शुरू हुआ गणेशोत्सव अब केवल आस्था तक सीमित न रहकर सामाजिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण का बड़ा माध्यम बन चुका है। प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से होने वाले नुकसान के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच इस बार धार में गणेश चतुर्थी के स्वागत की एक अत्यंत प्रेरक और संवेदनशील तस्वीर सामने आई है। यहाँ आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा और मानवीय गरिमा का सुंदर मेल देखने को मिल रहा है।
आगामी गणेशोत्सव के उपलक्ष्य में धार स्थित श्रद्धालय वृद्धाश्रम के बुजुर्गों ने गाय के गोबर और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग कर भगवान गणेश की आकर्षक व पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएं तैयार की हैं। इन प्रतिमाओं की विशेषता यह है कि इन्हें पर्व के बाद घर पर ही किसी गमले में या स्थानीय जल संरचना में आसानी से विसर्जित किया जा सकता है, जिससे जल स्रोतों में प्रदूषण नहीं फैलेगा। वृद्धजनों द्वारा पूरे उत्साह और श्रम से तैयार की गई ये विशेष प्रतिमाएं आम नागरिकों के लिए श्रद्धालय वृद्धाश्रम, भोज उद्यान और लाल बाग स्थित विक्रम ज्ञान मंदिर परिसर में बिक्री के लिए उपलब्ध कराई गई हैं।
आश्रम प्रबंधन ने शहरवासियों से अपील की है कि वे पीओपी की मूर्तियों के स्थान पर इन प्राकृतिक प्रतिमाओं को प्राथमिकता दें। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण और जल स्रोतों को दूषित होने से बचाना तो है ही, साथ ही इसके जरिए जीवन के इस पड़ाव में रह रहे बुजुर्गों में स्वावलंबन, आत्मसम्मान और नए उत्साह का संचार करना भी है। यदि समाज का सहयोग मिलता है, तो यह कदम न केवल पारंपरिक मूर्तिकला में प्राकृतिक विकल्पों के चलन को गति देगा, बल्कि वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों के कौशल को मंच देकर उन्हें मुख्यधारा और स्वावलंबन से जोड़ने का एक स्थायी मॉडल भी तैयार करेगा।
