‘परियोजना जल धारा’ से 1.5 एकड़ में आय 3.5 गुना बढ़ी, 72 हजार से पहुंचे 2.5 लाख
धार के किसान सुमित ने बदली खेती की तस्वीर
धार। डेढ़ एकड़ जमीन, पानी की कमी और पारंपरिक खेती से सीमित कमाई—यह कई छोटे किसानों की साझा हकीकत है। लेकिन जब सही तकनीक और वैज्ञानिक मार्गदर्शन का साथ मिला, तो धार के एक छोटे किसान ने इसी सीमित जमीन से अपनी तकदीर बदल दी। कभी सालभर में मात्र 72 हजार रुपए कमाने वाले सुमित भाटिया ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर अपनी सालाना आय सीधे 2.5 लाख रुपए तक पहुंचा दी है।
धार जिले के ग्राम फरसपुरा में 27 सितंबर को सामने आई इस सफलता के केंद्र में किसान श्री सुमित भाटिया और ‘परियोजना जल धारा’ है। इस परियोजना के तहत कृषि विशेषज्ञों ने सुमित के खेत का चयन कर उन्हें जल-कुशल तकनीकों और व्यावसायिक फसल उत्पादन से जोड़ा। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में पारंपरिक मक्का-कपास की खेती के साथ उच्च मूल्य वाली सब्जियों का उत्पादन शुरू किया गया, जिसके लिए उन्हें 1,000 गुणवत्तापूर्ण टमाटर के पौधे उपलब्ध कराए गए।
वैज्ञानिक तौर तरीकों से उपज की क्वालिटी बनी बेहतर
खेती के इस कायाकल्प में प्रिसिजन ड्रिप (सूक्ष्म सिंचाई) तकनीक ने अहम भूमिका निभाई, जिससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचा। इसके साथ ही खेत में प्लास्टिक मल्चिंग लगाई गई, जिससे जमीन में नमी बनी रही, खरपतवार पर लगाम लगी और पानी का वाष्पीकरण रुका। टमाटर व लता वर्ग की फसलों को बीमारियों से बचाने और बेहतर बढ़वार के लिए ट्रेलिसिंग (सहारा देने की संरचना) का इस्तेमाल किया गया। समय-समय पर कीट-व्याधि नियंत्रण और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के वैज्ञानिक तौर-तरीकों ने उपज की गुणवत्ता को बेहतर बना दिया।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का जताया आभार
तकनीक और सही प्रबंधन के संयोजन से सुमित भाटिया की 1.5 एकड़ भूमि से होने वाली वार्षिक आय 72 हजार से बढ़कर 2 लाख से 2.5 लाख रुपए तक पहुंच गई, जो लगभग 3.5 गुना की वृद्धि है। सुमित ने इस उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का आभार जताया है।
अन्य किसानों को कर रहे प्रेरित
परियोजना से जुड़ने से पहले सुमित पूरी तरह वर्षा और पारंपरिक बाढ़ विधि (फ्लड इरिगेशन) से सिंचाई पर निर्भर थे, जिससे सीमित आय ही मिल पाती थी। सीमित जमीन और जल संकट के बीच आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से मिली यह कामयाबी अब क्षेत्र के अन्य छोटे व सीमांत किसानों को भी पारंपरिक तौर-तरीके छोड़कर जल-कुशल और व्यावसायिक खेती अपनाने की दिशा में प्रेरित कर रही है।
