नई दिल्ली। इंडस्ट्री वाले हों या बड़े कमर्शियल खिलाड़ी, अब वो फिर से आपके पड़ोस वाले पेट्रोल पंप से जितना चाहें उतना डीजल खरीद सकेंगे। जी हां, सरकार ने 1 जुलाई 2026 से पेट्रोल और डीजल की बिक्री से जुड़ी वो पाबंदी हटा ली है, जो जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए लगाई गई थी।
अब आप सोच रहे होंगे कि भला सरकार को पेट्रोल-डीजल बेचने पर लिमिट क्यों लगानी पड़ी थी? तो चलिए, इसके पीछे का पूरा ‘खेल’ और पश्चिम एशिया का कनेक्शन आपको आसान भाषा में समझाते हैं।
पूरा मामला क्या था
कुछ समय पहले जब पश्चिम एशिया में संकट गहराया, तो इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। आम जनता पर महंगाई की मार न पड़े, इसलिए सरकार ने सूझबूझ दिखाई और देश में पेट्रोल-डीजल की खुदरा (Retail) कीमतों को बढ़ने नहीं दिया।
लेकिन यहीं से शुरू हुआ असली ट्विस्ट:
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आम जनता के लिए पेट्रोल-डीजल सस्ता रहा।
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लेकिन फैक्ट्रियों, बड़ी कंपनियों और कमर्शियल (थोक) खरीदारों के लिए कीमतें महंगी थीं।
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नतीजा: थोक में महंगा डीजल खरीदने के बजाय, बड़े-बड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ता अपनी गाड़ियां और ड्रम लेकर आम जनता वाले रीटेल पेट्रोल पंपों पर लाइन लगाने लगे।
क्यों लगानी पड़ी थी ‘लक्ष्मण रेखा’
जब बड़े खिलाड़ी आम जनता के कोटे के ईंधन पर टूटने लगे, तो बाजार में गड़बड़ी शुरू हो गई। हेराफेरी, जमाखोरी और कालाबाजारी की खबरें आने लगीं। आम आदमी को डीजल मिलने में दिक्कत न हो, इसलिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने 12 जून 2026 को एक कड़ा फैसला लिया:
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खुदरा दुकानों पर प्रति ग्राहक/वाहन रोजाना सिर्फ 200 लीटर डीजल की सीमा तय कर दी गई।
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औद्योगिक और कमर्शियल उपभोक्ताओं को साफ कह दिया गया कि वे रीटेल पंपों पर भीड़ न लगाएं, बल्कि अपने लिए तय ‘कंज्यूमर पंप्स’ से ही तेल खरीदें।
अब क्या बदला
सरकार ने देश में पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई की दोबारा समीक्षा की है। अब हालात पूरी तरह काबू में हैं और तेल की कोई कमी नहीं है। सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि जनहित में अब इन पाबंदियों की कोई जरूरत नहीं है। इसलिए 12 जून का वो आदेश 1 जुलाई 2026 से पूरी तरह वापस ले लिया गया है।
सरकार के इस फैसले से साफ है कि देश में ईंधन की सप्लाई चेन अब फिर से पटरी पर लौट आई है। संकट के दौर में जनता की जेब को बचाते हुए सरकार ने जो अस्थाई ब्रेक लगाया था, अब उसे हटाकर बाजार को पुरानी रफ्तार दे दी गई है।
