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मप्र पुलिस में ‘कार्यवाहक प्रभार’ की व्यवस्था स्थगित : अब होगी 20 हजार पुलिसकर्मियों की नियमित पदोन्नति, PHQ के निर्देश जारी

भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस विभाग में सालों से चल रही ‘कार्यवाहक प्रभार’ की अस्थाई व्यवस्था पर आखिरकार विराम लग गया है। पुलिस मुख्यालय के इस बड़े फैसले से जहां एक तरफ 5 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों के प्रमोशन पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, वहीं अब नियमित और थोक पदोन्नति का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। विभाग ने साफ कर दिया है कि अब किसी भी अधिकारी को बिना परमानेंट प्रोसेस के उच्च पद की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी।

भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पुलिस महानिदेशक के निर्देशों के बाद पुलिस विभाग में नियमित पदोन्नति शुरू करने की तैयारी कर ली है। इस नए आदेश के तहत फिलहाल 95 इंस्पेक्टर्स को डीएसपी बनाने और एसएएफ में सब-इंस्पेक्टर्स को उच्च पद का प्रभार देने की अस्थाई कार्रवाई को रोक दिया गया है। शासन का लक्ष्य अब लगभग 20 हजार पुलिसकर्मियों को जल्द से जल्द नियमित पदोन्नति देकर पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है।

इस व्यवस्था के बीच उन पुलिसकर्मियों की चिंताएं भी सामने आई हैं जिन्होंने प्रशासनिक जरूरतों के कारण कार्यवाहक प्रभार संभाला था। कई कर्मियों का मानना है कि यदि समय पर रेगुलर प्रमोशन होते, तो वे अपने मूल पद पर ही रहते और उच्च पद की जिम्मेदारियों के दौरान पैदा हुई परिस्थितियों के कारण उन्हें विभागीय कार्यवाही का सामना नहीं करना पड़ता। उनका सवाल है कि शासन की बनाई इस अस्थाई व्यवस्था का खामियाजा सिर्फ वे ही क्यों भुगतें।

पदोन्नति में विभागीय जांच, लंबित मामलों या पूर्व में मिली सजा वाले कर्मियों को अनफिट माना जा सकता है।

2016 से क्यों अटका है मामला?

इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2016 से जुड़ी हैं। अप्रैल 2016 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित 2002 के नियमों को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था, जिसके बाद से राज्य में नियमित प्रमोशन पर रोक लग गई थी। अधिकारियों के रिटायर होने और प्रशासनिक काम प्रभावित होने के कारण सरकार ने 2021 में पुलिस रेगुलेशन एक्ट में संशोधन कर बिना अतिरिक्त वेतन के ‘कार्यवाहक प्रभार’ (उच्च पद की वर्दी और स्टार) देने की व्यवस्था शुरू की थी।

हाल ही में सरकार द्वारा लाए गए नए पदोन्नति नियमों (2025-2026) को भी कर्मचारी संगठनों ने हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है। वर्तमान में इस जटिल मामले पर न्यायालय में अंतिम सुनवाई चल रही है, जिसके कारण विभाग के आगामी सभी पदोन्नति आदेश कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।

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